मेरे जीवन की कविता हो तुम , मेरे प्रेम -रस की सरिता हो तुम
निकला हु ‘ज़रना’ बनकर एक पहाड़ से , जिसमे समाने की आस हे वो एक नदिया हो तुम.
- मेरे जीवन की कविता हो तुम …
किसी और के बगिया का गुलाब हो तुम , फिर भी उसकी दो पंखुडियो का ‘असबाब’ हो तुम ,
जो प्यासा हे उसके रस का – ऐसे आवारा भवरे का ख्वाब हो तुम
- मेरे जीवन की कविता हो तुम …
संसार एक नदिया हे , जिसे बहेने को तो अभी सदिया हे ,
एक बूंद जिसमे समानी हे , वो प्यारभरा दरिया हो तुम.
- मेरे जीवन की कविता हो तुम …
एक पत्थर की तराशी मूरत हो तुम , कोए जल -परी सी खुबसूरत हो तुम ,
किसी शिल्पकार की कल्पना हो तुम , जिसके ईश्वर की साक्षात्कार हो तुम.
- मेरे जीवन की कविता हो तुम …
हम नदिया के दो किनारे हे , जो दूर से एक दुसरे को निहारते हे ..
तय हे न मिल पाना एक दुसरे से फिर भी , उस दुसरे किनारे की आशा हो तुम.
- मेरे जीवन की कविता हो तुम …