पडघो
पडघो - चीराग पटेल ऑक्टोबर 16, 2008
भरेली आशानो रणकार खोवाई जाय छे,
खोखली नीराशानो पडघो पडतो जाय छे.
तुं ना आवे तो सुनकार काळो छवाई जाय छे,
टमटमतो दीवडो धीमेथी मुरझाई जाय छे.
मनसरोवरमां तुं ज्यारे यादोनो पथरो फेंके छे,
एकलतानो मच्छ आतमनो मीन गळी जाय छे.
अडाबीड जगतनां, ज्यां खोजतो फरुं तने ज्यारे,
दुनीयादारीना सावज आ हंसलो फाडी खाय छे.
यादोनी आग नीपजावे छे ज्यारे प्रेमनी भस्म,
अंगे लगाडी ए, संतोष तारा मीलननो माणुं छुं.
तरणुं शोधुं जुनुं ने जाणीतुं, पहोंचुं ‘मा’ना शरणे,
यादो ओलवाती जाय छे, भस्म वीखेराती जाय छे.
तने हशे आ ज मंजुर, ‘मा’ने पण लागे छे मंजुर,
क्यां चाले छे मारी मरजी, स्वीकारी, मन मोटुं करी.
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રણકાર આશાનો અને પડઘો નીરાશાનો … ચીંતન કરવા જેવો વીચાર ..
तरणुं शोधुं जुनुं ने जाणीतुं, पहोंचुं ‘मा’ना शरणे,
यादो ओलवाती जाय छे, भस्म वीखेराती जाय छे.
तने हशे आ ज मंजुर, ‘मा’ने पण लागे छे मंजुर,
क्यां चाले छे मारी मरजी, स्वीकारी, मन मोटुं करी.
આ ચીલાચાલુ ભારતીય પરંપરાના વીચાર સાથે હું સમ્મત થઈ શકતો નથી. ગીતાવાક્ય યાદ કરો
कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषू कदाअचन
તારી જો વાત સુણી કોઈ ના આવે રે!
તો તું એકલો જાને રે !